Tuesday, 31 December 2013

गीत टूटे हुए- 2

आज तुम भी कह दो कोई तालुक नहीं है मुझसे तुम्हारा
शहर में हर अजनबी से हंसना बोलना हो गया है मेरा |

इक शर्त थी इलाही तेरी, वही बेशर्त निभा रहा हूँ
छलनी है सीना मगर, मैं गीत गा रहा हूँ
वादा था बन्दे से तेरे, या जिद थी कभी न गाने की.. अब याद नहीं
जुबां पे कायम हूँ मगर, ईमां से जा रहा हूँ |

इक बार उठाये थे कुछ सवाल जो काफिरों ने नीयत पर अब्दुल की 
खुदा लिख रखा है जवाब मेरी ज़मीर के पन्नों पर हर रोज़ बाकायदा 
तुम कहते हो कभी लफ़्ज़ों में किया नहीं बयां मैंने पाक्नामा उसका 
जुबां तो सुनो मेरी जो उर्दू हो गयी,महज़ उस दीवाने का नाम लेने से|

कितनी सिमटी हैं ये प्रेरणा, और कितना ऊंचा है आसमा मेरा
कितनी धुंधली हैं ये आखें मेरी, कितना विस्तृत है ये जहाँ मेरा 
चलो बिना कागज़ कलम के आज एक छंद बनायें,
अनंत की खोज में उड़ें, आओ आज अनंत हो जाएँ| 

क्या कहिये इस नाजो-नजाकत को, इस चकाचौंध के दौर को 
आँखों की सुर्ख़ियों को क्या कहिये, क्या कहिये अदबो-अदा के ठौर को 
कहिये माफ़ी, कि हम तो बेबस कुदरत से हुआ करते हैं, 
क्या कीजिये हुज़ूर, गीत तो हम आज भी, आखें मूंदें ही सुना करते हैं |

कुछ तो राबता था तेरी हस्ती से मेरा,
तू जो मिटा है, तो बाकी हम भी हैं कहाँ,
तू छूकर देख कितनी झुलसी है धरती मेरी इस सुबह ,
उगते सूरज के टुकड़े जो धुल में मिले हैं आज यहाँ|

कराया इंतज़ार सारी महफ़िल को हमने, बस इक तुम्हारे इंतज़ार में
इतना तो कह दो इक दफे, कि तुम मेरे मेरे बुलाने से आये 
क्या मालूम तुम्हे, कल दिवाली थी, कितनी रौनक थी मोहल्ले में,
तुमने दीदार न दिया, तो हमने दीये नहीं जलाये|

इक रोज़ भूल कर देखो खामियां मेरी, मेरे वाशिंदों
मैं वतन तुम्हारा आज तुम्हे पुकारता हूँ इक टूटे किले से 
गाओ गीत कि आज भी बुझी नहीं हैं लौ प्रेम की 
मनाओ जश्न कि सोने की चिड़िया ,ह्रदय से आज भी आज़ाद है | 

इक पथ ये निर्मम काटों भरा, दूजी ये तुम्हारी बेरुखी 
धीमा ज़हर निगलता जिजीविषा, उस पर पथ्य की सुविधा नहीं 
नेपथ्य में जिससे मिले, हर शख्स अपना सा लगा
मंच ने आँखें यूँ बदलीं , प्रतिबिम्ब भी था अजनबी
पर्दा गिरा अब दृश्य ओझल, भू छू गए चिर स्वप्न-पर्वत,
अब प्रीत का भ्रम ना रहा, ना सत्य की दुविधा रही|

आओ सुलझा दो मुझे,
फिर से जाने लगी है जिजीविषा लौट कर पुराने टापू पर,
ये अंतर्मन के दीमक फिर से खाने लगे हैं भीतर के पन्ने 
मायने खोने लगी हैं फिर प्रेरणाएं
आओ बताओ मुझे राहें और भी हैं 
आओ रोक लो मुझे या चलने का हौंसला दे दो 
बताओ मुझे ये सब सुखद अंत के अनुक्रम हैं सारे,
कोई वजह दे दो फिर से, 
आओ सपनों का जहाँ कोई, फिर से दिखला दो मुझे,
आओ सुलझा दो मुझे।

Strings of Vivacity-1

Did you drink poison?

Did you drink poison last night, my dear?
I can see your eyes gradually losing their sheen..
Your smile covers up a great deal the inner commotion that is,
albeit the signs of suffocation on your face,
talk to me like a close friend does..
yes the way you did long ago in the springs those were!
The part of you that reflected me is rotting, dying every moment..
We've parted ways, though the memories bloom in the pieces of a broken vase.. 
As this night passes by ,taking toll on all our dreams
and I lose you to the drugs that have kept me alive,
I'll let the shards today pierce me, make me bleed to death...
but death, as you know, my vivacity, is the last thing I fear..
Lest I should close my eyes and die unfulfilled, let me know
Did you drink poison last night, my dear?

Strings of Vivacity-2

The Last Gamble

Tell me there is more to it than my eyes see, 
and today I'll forgive you for the hyperbole
Tell me I'll come out alive of this play,
I have got to play another role..
Tell me this world is a beautiful place,
and there is more to it than this frantic race,
I would take as gospel truth anything fancy you might say,
But My dear, why envelops us all, this eerie silence today?

Waited for this long I have,
drawing parallel lines on spotless sheets
Downplayed myself to the end, 
just to catch a glimpse of my lost vivacity
Walk a mile for me, or walk away, I am at peace
I just played the last gamble of my life.

अब्दुल दीवाना

कितने ख़्वाबों में खोता,
कितनी रातें न सोता,
कितनी बातों पे रोता अब्दुल दीवाना,

उठा कर सर इबादत में आसमां की ओर,
हंस पड़ा वो बेवजह पागलों की तरह,
बरसी बूँद बनकर फकीरी की शोहरतें उस पर,
हँसता चल पड़ा वो आवारा बादलों की तरह,

कभी हंसा मस्जिद के सूनेपन में शह खोजती नमाज़ पर,
हंसा कभी वो मंदिर में सदियों से सोयी मूरतों पर,
कभी फितूर पे हंसा अपने, कभी दस्तूर पर दुनिया के हंसा, 
तो कभी चाँद को अपना कहते, अपनी जैसी सूरतों पर 

वो आधे चाँद के गुरूर पर भी हंसा, 
और हंसा अकेली रात के रोने पर, 
कभी जुगनुओं के टिमटिमाने पे हंसा,
तो कभी टूटे तारों के खोने पर,

कभी हंसा वो सुन्दर कल के सपने पर,
तो कभी रंजिश में बीते सालों पर हंसा,
कभी हंसा दिलेर शायर वो खुद पर,
तो कभी अपनी हंसी उड़ाने वालों पर हंसा

Parallel Lines


She woke up, rubbing her eyes
another dream lost, forgotten
On the doorsteps lay a postcard
wet from whole night's dew 
lending moisture to her eyes
She stooped in excitement, 
her spects broken
Another sense impaired, 
Another reason lost
smiling to herself like a madcap,
picking up remains of last night's ecstasy,
fisting them together in her torn stole, 
In the backdrop, a set of parallel lines....
on an endless, meaningless journey
stared at each other in helplessness.

पुरानी किताब


दीमक के चंगुल में फंसी, 
पुरखों की पुरानी अलमारी को खोला इक रोज़
तो मधुमख्खियों के छत्तों,  
और धूल मिट्टी के आशियाने से बढ़कर भी चीज़ें 
थी उसमें बंद अरसे से
ये कुछ-कुछ समझा,कुछ जाना मैंने ,
पर कुछ समझ के परे भी सौगातें थी उसमें छुपी
मेरे इंतज़ार में मानो सदियों से बूढी होती   
उन फटे पन्नों से जाने क्या रिश्ता था मेरा 
पुर्जों को तह लगाकर सलीके से,   
क्यों रखा था बेबात किसी ने बरसों तक संजोकर    
उस पुरानी किताब में ऐसा क्या ख़ास छिपा था
जो जिंदा रहा समय से परे, 
वो वक़्त की परतों से पीले हुए पन्ने 
क्यूँ मुझे बंधक कर रहे थे 
अकारण ही अपने गहरे तिलिस्म के जालों में

खैर,वो दिन कैसे गुज़रे उस किताब के साथ
अब कुछ ख़ास याद नहीं आता मुझे   
बस कुछ धुँधली सी परछाइयां जब-तब 
उभर आती हैं मेरे चरित्र के पहलुओं में  
कुछ पंक्तियाँ यूँ ही जीवंत हो उठती हैं
उस पुरानी किताब के फटे पन्नों से
कभी रामधुन, कभी कबीर के दोहे 
कभी मीरा,खुसरो का दीवानापन याद आता है
वो अमर हुए अशफ़ाक और राम  
के बोलों को मन दोहराता है
वो अर्थी पर लेटा किसान
यूँ ही झकझोर जाता मुझे 
वो गांधी की टूटी छड़ी 
मन देख सच में घबराता है

पर फिर देख दिशा और भेड़चाल 
मैं फिर से काबिल हो जाता हूँ     
अरे ये सब तो बस मनोवेग हैं पल दो पल के 
मिथ्या पहलू मात्र हैं भाव-विह्वल मन के 
वो पुरानी किताब तो आज भी उसी अलमारी में 
बंद रखी है,
मैंने उसे पढ़ा भी या नहीं कभी क्या पता,
शायद धीरे-धीरे वो किस्से-कहानी 
तुडकर-मुड़कर खुद ही उन पन्नों में छप आये हों 
किसी सपने से हकीकत की कड़ियाँ 
ज्यों अनायास ही जुडती सी चली आयीं हों 
वो फटे पन्ने इतने पुराने--ज़रूर किसी दिन 
ख्वाब में ही देखे होंगे मैंने | 


Friday, 22 November 2013

Am I?

Eyes, mere sense organs, no depth, no charm
eyes, that call me a failure at large
All reflections that you see, meaningless to the core
Am I a mere manifestation of what's written on the walls of your room?

Come, talk to me as I lose my voice to this hue and cry
Come, stand up for me, as I throw away my crutches and fly 
You say I am the naivest of all you've ever met
Am I what you say is the attribute, most worthless of all?

My days in exile pass by, amidst the words that cut like swords
Come see the wounds that never heal, come witness what you've gifted me with, at large!
As my sense of guilt surpasses the physicality of your senses,
Am I all that you can perceive, am I all that it takes to walk across a narrow lane?
Your eyes, truthful, they say they are, that call me a failure at large!
Am I what it takes to see the other side of the coin?