आज तुम भी कह दो कोई तालुक नहीं है मुझसे तुम्हारा
शहर में हर अजनबी से हंसना बोलना हो गया है मेरा |
इक शर्त थी इलाही तेरी, वही बेशर्त निभा रहा हूँ
छलनी है सीना मगर, मैं गीत गा रहा हूँ
वादा था बन्दे से तेरे, या जिद थी कभी न गाने की.. अब याद नहीं
जुबां पे कायम हूँ मगर, ईमां से जा रहा हूँ |
इक बार उठाये थे कुछ सवाल जो काफिरों ने नीयत पर अब्दुल की
खुदा लिख रखा है जवाब मेरी ज़मीर के पन्नों पर हर रोज़ बाकायदा
तुम कहते हो कभी लफ़्ज़ों में किया नहीं बयां मैंने पाक्नामा उसका
जुबां तो सुनो मेरी जो उर्दू हो गयी,महज़ उस दीवाने का नाम लेने से|
कितनी सिमटी हैं ये प्रेरणा, और कितना ऊंचा है आसमा मेरा
कितनी धुंधली हैं ये आखें मेरी, कितना विस्तृत है ये जहाँ मेरा
चलो बिना कागज़ कलम के आज एक छंद बनायें,
अनंत की खोज में उड़ें, आओ आज अनंत हो जाएँ|
क्या कहिये इस नाजो-नजाकत को, इस चकाचौंध के दौर को
आँखों की सुर्ख़ियों को क्या कहिये, क्या कहिये अदबो-अदा के ठौर को
कहिये माफ़ी, कि हम तो बेबस कुदरत से हुआ करते हैं,
क्या कीजिये हुज़ूर, गीत तो हम आज भी, आखें मूंदें ही सुना करते हैं |
कुछ तो राबता था तेरी हस्ती से मेरा,
तू जो मिटा है, तो बाकी हम भी हैं कहाँ,
तू छूकर देख कितनी झुलसी है धरती मेरी इस सुबह ,
उगते सूरज के टुकड़े जो धुल में मिले हैं आज यहाँ|
कराया इंतज़ार सारी महफ़िल को हमने, बस इक तुम्हारे इंतज़ार में
इतना तो कह दो इक दफे, कि तुम मेरे मेरे बुलाने से आये
क्या मालूम तुम्हे, कल दिवाली थी, कितनी रौनक थी मोहल्ले में,
तुमने दीदार न दिया, तो हमने दीये नहीं जलाये|
इक रोज़ भूल कर देखो खामियां मेरी, मेरे वाशिंदों
मैं वतन तुम्हारा आज तुम्हे पुकारता हूँ इक टूटे किले से
गाओ गीत कि आज भी बुझी नहीं हैं लौ प्रेम की
मनाओ जश्न कि सोने की चिड़िया ,ह्रदय से आज भी आज़ाद है |
इक पथ ये निर्मम काटों भरा, दूजी ये तुम्हारी बेरुखी
धीमा ज़हर निगलता जिजीविषा, उस पर पथ्य की सुविधा नहीं
नेपथ्य में जिससे मिले, हर शख्स अपना सा लगा
मंच ने आँखें यूँ बदलीं , प्रतिबिम्ब भी था अजनबी
पर्दा गिरा अब दृश्य ओझल, भू छू गए चिर स्वप्न-पर्वत,
अब प्रीत का भ्रम ना रहा, ना सत्य की दुविधा रही|
आओ सुलझा दो मुझे,
फिर से जाने लगी है जिजीविषा लौट कर पुराने टापू पर,
ये अंतर्मन के दीमक फिर से खाने लगे हैं भीतर के पन्ने
मायने खोने लगी हैं फिर प्रेरणाएं
आओ बताओ मुझे राहें और भी हैं
आओ रोक लो मुझे या चलने का हौंसला दे दो
बताओ मुझे ये सब सुखद अंत के अनुक्रम हैं सारे,
कोई वजह दे दो फिर से,
आओ सपनों का जहाँ कोई, फिर से दिखला दो मुझे,
आओ सुलझा दो मुझे।
शहर में हर अजनबी से हंसना बोलना हो गया है मेरा |
इक शर्त थी इलाही तेरी, वही बेशर्त निभा रहा हूँ
छलनी है सीना मगर, मैं गीत गा रहा हूँ
वादा था बन्दे से तेरे, या जिद थी कभी न गाने की.. अब याद नहीं
जुबां पे कायम हूँ मगर, ईमां से जा रहा हूँ |
इक बार उठाये थे कुछ सवाल जो काफिरों ने नीयत पर अब्दुल की
खुदा लिख रखा है जवाब मेरी ज़मीर के पन्नों पर हर रोज़ बाकायदा
तुम कहते हो कभी लफ़्ज़ों में किया नहीं बयां मैंने पाक्नामा उसका
जुबां तो सुनो मेरी जो उर्दू हो गयी,महज़ उस दीवाने का नाम लेने से|
कितनी सिमटी हैं ये प्रेरणा, और कितना ऊंचा है आसमा मेरा
कितनी धुंधली हैं ये आखें मेरी, कितना विस्तृत है ये जहाँ मेरा
चलो बिना कागज़ कलम के आज एक छंद बनायें,
अनंत की खोज में उड़ें, आओ आज अनंत हो जाएँ|
क्या कहिये इस नाजो-नजाकत को, इस चकाचौंध के दौर को
आँखों की सुर्ख़ियों को क्या कहिये, क्या कहिये अदबो-अदा के ठौर को
कहिये माफ़ी, कि हम तो बेबस कुदरत से हुआ करते हैं,
क्या कीजिये हुज़ूर, गीत तो हम आज भी, आखें मूंदें ही सुना करते हैं |
कुछ तो राबता था तेरी हस्ती से मेरा,
तू जो मिटा है, तो बाकी हम भी हैं कहाँ,
तू छूकर देख कितनी झुलसी है धरती मेरी इस सुबह ,
उगते सूरज के टुकड़े जो धुल में मिले हैं आज यहाँ|
कराया इंतज़ार सारी महफ़िल को हमने, बस इक तुम्हारे इंतज़ार में
इतना तो कह दो इक दफे, कि तुम मेरे मेरे बुलाने से आये
क्या मालूम तुम्हे, कल दिवाली थी, कितनी रौनक थी मोहल्ले में,
तुमने दीदार न दिया, तो हमने दीये नहीं जलाये|
इक रोज़ भूल कर देखो खामियां मेरी, मेरे वाशिंदों
मैं वतन तुम्हारा आज तुम्हे पुकारता हूँ इक टूटे किले से
गाओ गीत कि आज भी बुझी नहीं हैं लौ प्रेम की
मनाओ जश्न कि सोने की चिड़िया ,ह्रदय से आज भी आज़ाद है |
इक पथ ये निर्मम काटों भरा, दूजी ये तुम्हारी बेरुखी
धीमा ज़हर निगलता जिजीविषा, उस पर पथ्य की सुविधा नहीं
नेपथ्य में जिससे मिले, हर शख्स अपना सा लगा
मंच ने आँखें यूँ बदलीं , प्रतिबिम्ब भी था अजनबी
पर्दा गिरा अब दृश्य ओझल, भू छू गए चिर स्वप्न-पर्वत,
अब प्रीत का भ्रम ना रहा, ना सत्य की दुविधा रही|
आओ सुलझा दो मुझे,
फिर से जाने लगी है जिजीविषा लौट कर पुराने टापू पर,
ये अंतर्मन के दीमक फिर से खाने लगे हैं भीतर के पन्ने
मायने खोने लगी हैं फिर प्रेरणाएं
आओ बताओ मुझे राहें और भी हैं
आओ रोक लो मुझे या चलने का हौंसला दे दो
बताओ मुझे ये सब सुखद अंत के अनुक्रम हैं सारे,
कोई वजह दे दो फिर से,
आओ सपनों का जहाँ कोई, फिर से दिखला दो मुझे,
आओ सुलझा दो मुझे।
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