Saturday, 21 February 2015

आवाज़ दो



तुम चले ख्वाबगाह से, जाने किस ओर
क्या गर्त में हो? आवाज़ दो

आवाज़ दो
कि तुम्हारी गूँज में मैं सुन सकूं खुद को
और मुझे सुनकर तुम्हे लगे
कि बदल गयी है आवाज़ तुम्हारी
टकराकर गुफा के पत्थरों से

आवाज़ दो
कि हौंसला हो मुझे; कि महज़ आवाज़ ही नहीं,
तुम कुछ और भी हो
या भाप बनकर तुम उड़ भी जाओ
तो आवाज़ रहे बंद होकर, चट्टानों के ह्रदय में

आवाज़ दो
कि आज़ाद हो सकूं मैं
अपनी महत्ता, अपने मामूलीपन के द्वंद्व-भावों से
आवाज़ दो कि तुम्हे छूकर मैं जीवित ख्वाब बन जाऊं
आवाज़ दो कि फूटकर निकली मैं अपनी आवाज़ बन जाऊं

आवाज़ दो कि ख़ामोशी बोलती है,
आवाज़ दो कि तुम हो,
आवाज़ दो बेवजह,
तुम सुन रहे हो न?    

Wednesday, 11 February 2015

Electrocution of a Dream

The loosely hung ends of your broken wire-frame silhouette,
like the live wires protruding from the bottom of
an abandoned electric pole of a deserted village
follow me through my sleep,
eager to clutch my hands.
A razor blade drops,
I take the cue, the circuit is closed.
I whisper to the bearded night,
'Save me from myself'

हंगामा है

कुछ एक तब्दीलियाँ, होश कहाँ?
खाबीता विसाल बेशाख्ता
लाज़मी है महज़ होना तेरा,
काजल-ओ-पाजेब हंगामा है

कोई चले कोई राहबर हो,
खुदापरस्त या कोई काफिर ही,
हवा चले तो तेरी खुशबू आये,
ज़िक्र-ए-बयान हंगामा है

तू नज़्म है तो फूट कर बह,
किसने रोका है तुझे?
किसका भरम किसकी हया,
शेर-ओ-ग़ज़ल हंगामा है

एक सांस है, एक डोर है,
टूटी चप्पलें हैं, क्या कैफियत?
पैबंद हैं कबसे अपने ही कपड़ों पर,
सीवन का रंज हंगामा है

खोजे किसे कौन, किस घडी?
डूबे तो डूबे तुझमे सारी ग़ज़लें, 
गौर से देखा, दरिया न बयार तुझमे   
तिनकों का शहर है और हंगामा है


 

The Beauty of Conflict



They served me nectar and poison,
in cups that looked alike,
I drank both, without a thought
and found both distasteful
They smiled at me, waiting for me to sing,
to pour out all that had seeped into my heart,
to see which of the two evils had won,
to resolve the conflict, and box up its beauty
in cups that looked alike
I spoke not a word, but returned the smile,
for I had drunk no more of any one than the other.
I overhear from the squabble, their cries in unison
I see in their hardened selves,
the winsomeness of my existence
Is nectar not an ally of poison?
Is silence not what envelopes music?

दवा

तुम कौन हो,
क्या हो, आज फिर सोचा मैंने 
टूटे हुए गीत का अंतरा? नहीं
आधे चाँद से निकली शीतल चांदनी? नहीं
आसमान के मुख पर बेढब फैला काजल? नहीं
उलझी हुई आँखों की बेफर्क हंसी? नहीं
साँसों की मुक्तक डोर, या अंग जिजीविषा का? 
श्वेत का सुकून, नील का फैलाव,
या तूफ़ान शांत करती पेड़ों की कतार?
नहीं! तुम इनमे से कुछ भी नहीं,
यदि तुम कुछ हो तो मेरी दवा
तुम भी सोचोगे, क्या महज़ दवा ? 

हाँ, ये सारी उपमाएं, सारा विस्तार,
ये गहराइयाँ, ये सत्य की तलाश
ये थकान, टूटन और धुप छाँव 
ये लोग-बाग़, ये उलझन-सुलझन,
स्नेह, अनुराग, अनुभूति- आभास
कच्चे-पक्के मांझे से बंधन,    
नींद, सुन्दर सपने,डरावने ख्वाब
शोर-संगीत,चकाचौंध और एकाकीपन,  
मुझे जब तब बीमार कर देते हैं,

तुम आते हो, और ह्रदय स्वतः ही खुल जाता है,
बह निकलती हैं सारी दुविधाएँ, पीडाएं 
और रक्त अणु थोड़े से नए हो जाते हैं,  
कुछ वक़्त लगेगा इन्हें फिर से पुराना होने में,
मुझे मालूम है, तुम मिलोगे मुझे इसी तरह,
फिर किसी शाम की खुराक बनकर|  

चाँद और जंजीरें

टिमटिमाते तारों की फुसफुसाहट में,
सुना है, चाँद रात के दामन में छिपा,
अब रात हो चुका है,
वो आधे-पौने खिलौने, चाँद से दिखने वाले
अब टूट चुके हैं, मिल चुके हैं शीत धरा की मिटटी में,
कोई खिड़की की जाली से एकटक देख रहा है आसमाँ की ओर,
इन सबके बीच आज अचानक यूँ ही,
रात अपने ही अँधेरे से ऊब गयी,
बहुत बरसों में पहली मर्तबा लगा है जैसे,
रात स्याह न रही, शादाब हो गयी है
आज अँधेरा छटने से पहले,
इसकी जंजीरें खुल चुकी होंगी |

LAZAHG

Here I lie in my makeshift grave,
and you sing from your broken cage;

In the autumn you recited a Ghazal,
and we parted as if we never had met

Oh! read the couplets backward, won't you?
so we can meet as if we never had parted

Kill me so we may both come alive,
Will my verses be the weapon of your choice?

They'll dig my abode open and find your wings,
Your voice will be the requiem for my heart.