Wednesday, 22 April 2015

पुराने लोग

पुराने लोग- धीमी पसरती मुस्कान की तरह,
चेहरे पर, गीली मिटटी में 
गहरी खुदी लम्बी छोटी रेखाओं की तरह,
स्वयं को दोहराते ख़्वाबों में झलक भर दीखते,
कभी घंटों बैठे रहते 
बोलते हुए, हँसते-खिलखिलाते, कभी चुप 
कभी आईने के किसी कोने से 
बिम्ब का कोण बदलते 
कभी सडकों पर अनजाने चेहरों में दिख जाते 
कभी धुंध लेते अभिव्यक्ति हमारी आदतों में,
कभी मौन होकर हमारे शब्दों की बीच की जगहों से झांकते 

दिए की परछाईं से ढक चुकी हथेलियों की छाप में,
रियर व्यू  मिरर पर लगे छोटे से अमित धूल के निशान  में,
समुद्र किनारे की रेत की तरह 
छायाओं की छायाओं में, भावों के भावो में 
जब देख सकते हैं हम उन्हें मगर पूछ नहीं सकते-
"कब से बंद हो यहाँ?
कैदी कौन? तुम या मैं?"

पुराने लोग, उन सभी चित्र-गंध-वाणी के बिम्बों में,
जो उतारते-उतारते हृदय में इतने गहरा गए,
की नए लोगों से हम कभी मिल ही नहीं पाये।

कविता और तुम

कविता ख़त्म नहीं होगी,
वह चल चुकी थी गंतव्य के लिए,
सूर्योदय से बहुत पहले

जब तुम्हारे मन में विचार का भ्रूण उपजा था
और उसे लेकर तुम चल रहे थे खुद में,
उसमे अपनी साँसें भरते हुए,
साँचे में ढालते हुए
उड़ते हुए, तैरते हुए
विचारों से उपजे विचारों में,
हवा से हलके, नदी से गहरे

वह पहला शब्द जो तुमने लिखा था,
गहन अनुभूति से पाया
जिसे बाँट सकते थे तुम केवल एक हृदय  के साथ
वह जो आत्मसात कर ले
तुम्हे और तुम्हारी कविता को

इन सबसे बहुत पहले जन्मी थी कविता,
और निकल चुकी थी अपने गंतव्य की ओर ,
गंतव्य जिसे तुम देख नहीं सकते,
जिसकी कल्पना भी नहीं कर सकते

तुम सूर्यास्त को देख सकते हो,
मगर डूब नहीं सकते-
सूर्य की लालिमा के साथ गहरे समुद्र में,
उग नहीं सकते भोर की फुटन के साथ, फ़ैल नहीं सकते
तुम साध नहीं सकते वो गहराइयाँ
जिनसे उपजी तुम्हारी कविता तुम्हे अपनी सी लगती है

कविता श्वास की तरह बहती है
और साथ कर लेती है तुम्हे भी
अपने अंतहीन सफर में क्षण भर का भागीदार बनाकर
और उसमे खोज लेते हो तुम कुछ अपना
नेत्रों के तालाब में अनंत की परछाईं सा

तुम्हारी नश्वरता माध्यम भी है और बाधा भी,
तुम्हारे और तुम्हारी कविता के बंधन की ।

विदा की कविता-3 / अंतिम

और कुछ विचार करने के बाद मुझे लगा,
कि सब सामान नहीं ले जा सकते हम एक शहर से दूसरे तक

 हाँ! कभी भी किसी पलायन में,
सब कुछ नहीं जाता रेल के डिब्बों में बैठकर,
आँखें मूंदे गुज़रते रास्तों से अनभिज्ञ,
रुक जाता एक ऐसी जगह पर जो न इस शहर में है,
न जहाँ हम जाएंगे उस शहर में,
वो गुम हो जाता है कहीं बीच रास्ते में,
थकान से, अनमने से, टूटन से, बेहोशी से
और फिर वो किसी का नहीं रहता,
जो नाम लेकर पुकार ले फिर उसका हो जाने तक

और इस विचार में डूबा मैं भी छूट जाऊँगा
किसी के स्मृतिचिन्ह की तरह,
किसी मित्र की नेत्र-आभा बनकर,
इस शहर से उस शहर के बीच में कहीं,
तुम पुकार लेना मुझे!
अजनबी राह की आवाज़ बनकर,
भटकते राही का सम्बल बनकर।

विदा की कविता -2

पत्तों से खाली, कटीली सी दिखने वाली
पेड़ की डालियों के झरोखे से,
चाँद दिखा नहीं जैसे दिखता है,
चित्रों में, बनावटों में, उपमाओं में,
रूपकों में, कवि की कल्पनाओं में

चाँद खो गया के ख्याल ने
रात को डरावने ख़्वाबों से भर दिया

आँखें मीचते सुबह उठी तो रात ने देखा,
डालियों पर चाँदनी की उजली,
सुनहरी पत्तियां निकली थी

वक़्त मिले तो अगले बसंत तुम
बैगनी फूलों वाले पेड़ की छाया में, या यूँ ही,
चाँद को देखना कभी, गौर से|

विदा की कविता-1

खिड़की से बाहर वाले बागीचे में खिलते हैं कुछ फूल
और फिर स्वभाव से, मुरझाकर सौंप अपने रूप गंध ऊष्मा
धरा में मिल जाते हैं

यह देख झुँझलाकर मैंने तोड़ दिया फूलदान अपना,
जिसमे लम्बे समय से कुछ मृत फूल
बाज़ारू इत्र में सने हुए,
अपनी नकली मुस्कान बिखेरते
पड़े हुए थे, झूठे यौवन की गाथा गाते

उन फूलों को मैं आज सुबह सुबह
एक जीवित कवि के मकबरे पर छोड़ आया।

Tuesday, 24 March 2015

बंधन

चाँद का एक कतरा,
पेड़ के एक तने पर टिका,
हरे पत्तों के बीच बड़ा सब्ज़ दीखता है

चाँद के किनारे घिसकर कोमल हो गए हैं,
मानो पिघलकर बहने लगेंगे
अभी शाखों पर, पत्तों पर

कुछ डालियाँ कटीली सी, झुरमुट बनाये
हवा से हिलती हैं दायें-बाएं
और चाँद को चुभ जाती हैं पोरें उनकी,
चाँद की कोमल देह पर
हवाओं के गान- डालों के नृत्य
के पैटर्न उभरते हैं

और देखते ही बनती है
चाँद की पकी हुई मुस्कान
पेड़ में बुने हुए चाँद के रेशे,
रेशे चाँद के या कि पेड़ के?

हर शाम आसमां से खिड़की तक,
जो दुधिया रास्ता तय करके,
तुम चले आते हो दबे पाँव,
उसका एक सिरा पेड़ की जड़ों में
फंसा मालूम होता है |

Saturday, 21 February 2015

आवाज़ दो



तुम चले ख्वाबगाह से, जाने किस ओर
क्या गर्त में हो? आवाज़ दो

आवाज़ दो
कि तुम्हारी गूँज में मैं सुन सकूं खुद को
और मुझे सुनकर तुम्हे लगे
कि बदल गयी है आवाज़ तुम्हारी
टकराकर गुफा के पत्थरों से

आवाज़ दो
कि हौंसला हो मुझे; कि महज़ आवाज़ ही नहीं,
तुम कुछ और भी हो
या भाप बनकर तुम उड़ भी जाओ
तो आवाज़ रहे बंद होकर, चट्टानों के ह्रदय में

आवाज़ दो
कि आज़ाद हो सकूं मैं
अपनी महत्ता, अपने मामूलीपन के द्वंद्व-भावों से
आवाज़ दो कि तुम्हे छूकर मैं जीवित ख्वाब बन जाऊं
आवाज़ दो कि फूटकर निकली मैं अपनी आवाज़ बन जाऊं

आवाज़ दो कि ख़ामोशी बोलती है,
आवाज़ दो कि तुम हो,
आवाज़ दो बेवजह,
तुम सुन रहे हो न?