Wednesday, 11 February 2015

LAZAHG

Here I lie in my makeshift grave,
and you sing from your broken cage;

In the autumn you recited a Ghazal,
and we parted as if we never had met

Oh! read the couplets backward, won't you?
so we can meet as if we never had parted

Kill me so we may both come alive,
Will my verses be the weapon of your choice?

They'll dig my abode open and find your wings,
Your voice will be the requiem for my heart.

संबल

मुझे याद है उस शहर से मेरा जाना,
वो कूचे में आखिरी मुलाकात हमारी,
मौन में गूंजती धडकनें,
वो तो बस आँखें थी जो जमी रही,
शब्द होते तो चरमराकर टूट जाते,
फिर तुमने रुमाल में बंधकर कोई तोहफा दिया मुझे,
बस इतना कहा- यह है तुम्हारा 'संबल';
फिर चुप्पी में, मायूसी में, एकाकीपन में, अजीजों के बीच
ख़ुशी में, जलने-बुझने में, ऊँचाई पर और गर्त में,
मेरे साथ रहा वो उपहार तुम्हारा,       
रुमाल में पड़ी वो गिरहें कभी मैंने मगर खोली नहीं,
कहीं कुछ मामूली सा सामान न बाँध दिया हो तुमने आनन-फानन में,
कहीं बेमानी न हो जाएँ वो सारे बंधन,
जो बुने हुए हैं, इस रुमाल के रेशों में परत-दर-परत  
कहीं गिरहें खुलते ही अपनी महानता के तले दबकर,
वजूद न खो दे 'संबल' मेरा|

The Choice

Here in this strange city,
where the deaf play the music,
the blind carry the torches,
what choice did he have, than to be mute tonight
and let the symphony within rip him apart
to be reborn or to be lost in anonymity
The city had all the faces, the hearts to pray for,
the hazy caricatures and smoky existences,
He had but himself to bear with,
he chose but himself to sing to.

कांच का परिंदा

कांच का परिंदा,
यूँ ही पंख फडफडाता है,
आँखों में आसमां,
और उड़ने से घबराता है

डरता है कहीं चकनाचूर हो ना जाएँ,
पंख उसके हवा के थपेड़ों से टकराकर
कहीं बदलते मौसम उड़ा न ले जाए,
किसी अजनबी देश उसे,
कहीं झाँक ना ले कोई पारदर्शी पर्दों से,
जान न ले मन की कहानी,
कहीं आंक न ले कोई साथी खोया वाशिंदा उसे,
कहीं भांप ना ले हवाएं कमसिन कांच का परिंदा उसे

इसलिए पिंजरे में बंद वो,
किसी म्यूजियम में गीत गुनगुनाता है,
लोगों के कौतुक में क्षण भर ही सही,
वो उड़ान की कशिश भूल जाता है,

मगर कुछ आँखें हंसती नहीं उस पर,
केवल सवालात करती हैं,
तब अनंत के ख्वाब को वो चुपके से सहलाता है,
किसी रोज़, हाँ किसी रोज़, सब बंधन तोड़कर
स्वच्छंद, उसे कल-कल बहते कांच में ही मिल जाना है,

पर तब तक वो कांच का परिंदा,
यूँ ही पंख फडफडाता है,
आँखों में आसमां,
और उड़ने से घबराता है

Tuesday, 10 February 2015

An Exalted Dream


When in the winter sun,
the voices of autumn perched on the branches
shall sing the sweet suffering of life
I'll walk barefoot from Kapilvastu to Bamiyan,
purchasing paperbacks at every haltage,
'Samsara' and 'Nirvana' smiling at each other.
I'll be the evening breeze that whispers,
to the monks and the worldly men alike,
I'll be the tree that hides the giant scars
on the face of the illustrious one.
I'll write to you one lazy afternoon,
and we'll meet and merge, we'll fly and flow
beyond names and forms.

Wednesday, 10 December 2014

ग़ज़ल



महज़ चलने से हो कम जो ये दूरियां जाना
तेरे कूचे में, पैरों के छालों को सबा मिलती

चाशनी में डुबोये तेरी रूह के चंद सब्ज़ कतरे,
तेरी खुशबू में भिगोई आब-ओ-हवा मिलती

नीम के ज़र्द पत्ते जो ख़त में लिपटे मिलें कभी,
बेइलाज सही, वल्लाह! इस मरीज़ को दवा मिलती

प्यास बुझे शबनम की, गुलशन में रानाई आये  
टूटे पत्तों में बेरंग खिज़ा, माह-ओ-साल जवां मिलती    

तेरे ज़िक्र से मुसलसल हाय! लहरें उठे चनाब में,
छूकर गयी तुझे खोने से, तेरे होने से कहाँ मिलती? 

महज़ चलने से हो कम जो ये दूरियां जाना
तेरे कूचे में, पैरों के छालों को सबा मिलती

Tuesday, 9 December 2014

वजूद



याद है तुम्हे पानी की वो परतें,  
जो घाट की खूटों से बाँध दी थी हमने,  
और सर्द रातों में उनके बर्फ हो जाने पर,
 इक सुबह चन्दन की लकड़ी से खुरचकर  
जो आँखें बना दी थी तुमने,  
और मौसम-दर-मौसम उन परतों पर और परतें,  
फिर और परतें जमती गयी,

उन सर्द रातों में,  
पानी का एकाकीपन, हम कहाँ?  
जेठ की तपिश में,
 बर्फ चश्म-ए नम, हम कहाँ?
निगाहें कब मिलीं, कब फ़ज़ा का तिलिस्म टूटा ?

सुना है बह गयीं वो जंजीरें,  
और वो खूंटे  जो सहेज कर रखे हुए थी,  सारी धरोहरें मौसम की 
 बर्फ की आँखें भी पिघली, और सब परतें, जंजीरें भी
रेत पर मौसमों की हथेलियों की छाप भेज रहा हूँ,  
वक़्त मिले तो बहते पानी का वजूद लिखना |