Wednesday, 11 February 2015

The Choice

Here in this strange city,
where the deaf play the music,
the blind carry the torches,
what choice did he have, than to be mute tonight
and let the symphony within rip him apart
to be reborn or to be lost in anonymity
The city had all the faces, the hearts to pray for,
the hazy caricatures and smoky existences,
He had but himself to bear with,
he chose but himself to sing to.

कांच का परिंदा

कांच का परिंदा,
यूँ ही पंख फडफडाता है,
आँखों में आसमां,
और उड़ने से घबराता है

डरता है कहीं चकनाचूर हो ना जाएँ,
पंख उसके हवा के थपेड़ों से टकराकर
कहीं बदलते मौसम उड़ा न ले जाए,
किसी अजनबी देश उसे,
कहीं झाँक ना ले कोई पारदर्शी पर्दों से,
जान न ले मन की कहानी,
कहीं आंक न ले कोई साथी खोया वाशिंदा उसे,
कहीं भांप ना ले हवाएं कमसिन कांच का परिंदा उसे

इसलिए पिंजरे में बंद वो,
किसी म्यूजियम में गीत गुनगुनाता है,
लोगों के कौतुक में क्षण भर ही सही,
वो उड़ान की कशिश भूल जाता है,

मगर कुछ आँखें हंसती नहीं उस पर,
केवल सवालात करती हैं,
तब अनंत के ख्वाब को वो चुपके से सहलाता है,
किसी रोज़, हाँ किसी रोज़, सब बंधन तोड़कर
स्वच्छंद, उसे कल-कल बहते कांच में ही मिल जाना है,

पर तब तक वो कांच का परिंदा,
यूँ ही पंख फडफडाता है,
आँखों में आसमां,
और उड़ने से घबराता है

Tuesday, 10 February 2015

An Exalted Dream


When in the winter sun,
the voices of autumn perched on the branches
shall sing the sweet suffering of life
I'll walk barefoot from Kapilvastu to Bamiyan,
purchasing paperbacks at every haltage,
'Samsara' and 'Nirvana' smiling at each other.
I'll be the evening breeze that whispers,
to the monks and the worldly men alike,
I'll be the tree that hides the giant scars
on the face of the illustrious one.
I'll write to you one lazy afternoon,
and we'll meet and merge, we'll fly and flow
beyond names and forms.

Wednesday, 10 December 2014

ग़ज़ल



महज़ चलने से हो कम जो ये दूरियां जाना
तेरे कूचे में, पैरों के छालों को सबा मिलती

चाशनी में डुबोये तेरी रूह के चंद सब्ज़ कतरे,
तेरी खुशबू में भिगोई आब-ओ-हवा मिलती

नीम के ज़र्द पत्ते जो ख़त में लिपटे मिलें कभी,
बेइलाज सही, वल्लाह! इस मरीज़ को दवा मिलती

प्यास बुझे शबनम की, गुलशन में रानाई आये  
टूटे पत्तों में बेरंग खिज़ा, माह-ओ-साल जवां मिलती    

तेरे ज़िक्र से मुसलसल हाय! लहरें उठे चनाब में,
छूकर गयी तुझे खोने से, तेरे होने से कहाँ मिलती? 

महज़ चलने से हो कम जो ये दूरियां जाना
तेरे कूचे में, पैरों के छालों को सबा मिलती

Tuesday, 9 December 2014

वजूद



याद है तुम्हे पानी की वो परतें,  
जो घाट की खूटों से बाँध दी थी हमने,  
और सर्द रातों में उनके बर्फ हो जाने पर,
 इक सुबह चन्दन की लकड़ी से खुरचकर  
जो आँखें बना दी थी तुमने,  
और मौसम-दर-मौसम उन परतों पर और परतें,  
फिर और परतें जमती गयी,

उन सर्द रातों में,  
पानी का एकाकीपन, हम कहाँ?  
जेठ की तपिश में,
 बर्फ चश्म-ए नम, हम कहाँ?
निगाहें कब मिलीं, कब फ़ज़ा का तिलिस्म टूटा ?

सुना है बह गयीं वो जंजीरें,  
और वो खूंटे  जो सहेज कर रखे हुए थीसारी धरोहरें मौसम की 
 बर्फ की आँखें भी पिघली, और सब परतें, जंजीरें भी
रेत पर मौसमों की हथेलियों की छाप भेज रहा हूँ,  
वक़्त मिले तो बहते पानी का वजूद लिखना |

Tuesday, 18 November 2014

पर्दा


वो सर्द रातें जिनमे कि,
तुम्हारी ओस से भीगी हुए पलकों की उलझन,
का मुआयना कर लिया करते थे खिड़की से,
बागीचे के पौधे ,और उनपर लगे ज़र्द फूल
और सुनते थे ग़ज़लें पुराने टेप में बजती हुई,
पर्दा पर्दा न था, ज़रिया था

और गुफ्तगू में कई बार,
हवा से लहराता वो पर्दा,
राज़ कह जाता अपनी बुनतर के,
सूत के रेशों में रंगरेज़ का खुमार,
और दरवाज़े, खिडकियों से मिलने की झिझक 
खूटियों पर टंगे रहने से हथेलियों पर पड़े छाले
और बागीचे से मिलकर, एक चिड़िया,
एक फूल बन जाने की जगी-सोयी हसरतें
पर्दा पर्दा न था, अज़ीज़ था

मेरी रूह की पड़ताल हो तो अब कुछ परदे निकलें,
रंग-ब-रंगे, तह-दर-तह लपेटे हुए, बुने हुए मेरे होने में,
उन पर्दों से ढक दी जाएँ वो ओस से धुंधली हुई खिड़कियाँ
और वो ज़बरन भीतर आते बागीचे, मुझे देखकर बेवजह मुस्कुराते
वो बसंत-खिज़ा के बेगैरत फूल, मेरे वजूद के कतरे चुराते
अब छुप जाएँ तुम्हारे दस्तखत और तुम्हारी खुशबू में,
तुम पर पड़े पर्दों में, या तुम्हारे पर्दा हो जाने में |

Wednesday, 5 November 2014

एक कागज़ का टुकड़ा

वो कागज़ का टुकड़ा जीवित था उस लिखावट को संगीत मानकर,
बेढब हाथों से उस पर थी कुछ अर्थहीन लकीरें खिंची हुई,
वो नज़्म नज़्म कहता था, सब शब्द शब्द सुनते थे 
हर व्यंग्य भरी हंसी थोडा सा मिटा देती थी उन लकीरों का अस्तित्व 
हर तिरस्कार रत्ती भर खा जाता था उस कोरे कागज़ की जिजीविषा 
इक रोज़ इक अँधा फ़कीर आया और ले गया उसे साथ अपने,
वो कलम, दवात, लकड़ी की तख्ती, 
वो पुरानी किताबें, वो पीले पन्ने, वो टूटा लालटेन 
वो स्लेट, श्यामपट्ट और गुरूजी के कमरे का टेढ़ा दरवाज़ा,
वो गीत, ग़ज़ल ,कवितायेँ, कहानियाँ, नाटक और हकीकत 
सब अर्थहीन बन गए शब्दों के अभाव में,
एक कागज़ के टुकड़े पर बेढब खिंची लकीरों की,
मोहताज हो गयी समस्त वर्णमाला|