Wednesday, 6 November 2013

Diwali-2

The city feels like a bride today
Lost in apprehensions and unknown fears
Today was a long day
Tonight is going to be a long night
Everyone saw her walking in the streets, 
dim hapless eyes piercing the layers of light 
Light from the bakery in the market,
light from the candles with flickering flames
light tracing its roots back to the ground
light soaring high in the sky
Lights all beautiful, lights all in vain
Obscurity rising thanks to the smoke around
Her silence silencing the outspoken crackers
Heights all charming, heights all in vain
She has got no wings
Her dim eyes laughing at the insane brightness 
She knows what it takes for the smoke to please
the innocent eyes she has seen getting blurred day by day
Dim eyes can't pierce the bright lights,
The hapless can't laugh at the privileged
The silent can't silence the outspoken
No-one saw her walking barefoot, 
no-one spared a moment for her
With no wings, no vision, no dreams
and a candle stolen from the factory owners's table
She feels like an orphan today
Lost in the darkness that contains it all,
Today was a long day
Tonight is going to be a long night.

Diwali-1

Cleaning the house a week before Diwali,
Grandma found in a dark corner of her daughter’s room
flakes of sunlight entangled in a dense cobweb
with tear drops vaporized for long, the fog filled the empty corner 
She broke the mesh apart and all of them were set free
The old lantern hung on the patched wall like it always did
The smell of kerosene never left the room though 
The evening sun lit up the hue of Henna, 
palm prints came alive bit by bit,
A smile talked to another in the silent milieu.

Wednesday, 23 October 2013

चिड़िया तुम उडती क्यों नहीं?

      
चिड़िया तुम उडती क्यों नहीं?
चिड़िया तुम गाती क्यों नहीं?
लिख दिए जो माथे पर तुम्हारे,
उन पैमानों में समाती क्यों नहीं?

देख नभ का फैलाव सखी, है जो पंख प्रतीक्षा में फैलाए
इच्छा तुम भी तो रखती होगी ऊँचाई को छूने की
क्या नभ का तप व्यर्थ ही हो जाने दोगी सखी ?
क्या पंखों को पंखों से मिलने न तुम दोगी सखी ?

देखो सुरों की हदें , जो आज अनहद में मिली हैं
झींगुर-मेंढक के समूह-गान में ,लोग कहते हैं मूक पक्षी तुम्हे
क्या बनी रहोगी यूँ ही धीरज की निश्चल प्रतिमा तुम?
क्या कंठ से अपने गुंजन रागों की होने न दोगी तुम ?

ये प्रश्न वर्षा जो मैं तुम पर करता हूँ,
सखी! सच बस दिखावा है, ऊपरी कर्तव्य है मेरा
कल अगर तुम सच में उड़ गयी और खो गयी नभ के विस्तार में कहीं,
या गीत मधुर सुनकर तुम्हारा, तुम्हे राजकुमार यदि ले गया
सच! छोटी-छोटी आँखों से जब तुम श्वेत चांदनी में मुझको तकती हो
वो अनुभूति कहो कोमल मन की, फिर मैं कहाँ से लाऊंगा
ये मूकता का सौंदर्य तुम्हारा, ये बहती नदी का शांत किनारा,
अब उर से मेरे अभिन्न है ,नभ के विस्तार से भी सुन्दर है  
तुम सरल हो सरल बनी रहना सखी,
मेरा स्वार्थ मगर तुम किसी से न कहना सखी,
तुम्हारी आँखों का विस्तार संगीत है मेरे जीवन का,
तुम्हारी अपूर्णता ही मुझे पूर्ण करती है|

पर लाचार हूँ सखी! राहगीरों के संतोष को,
फिर से वही बेतुके प्रश्न करूँगा तुमसे ,
मन को मारकर, झूठी जिज्ञासा का मुखौटा चेहरे पर लगाकर
एक अज्ञात भय को अपनी कला से छुपाकर,
कल फिर निर्लज्ज होकर तुमसे यही कहूँगा,

चिड़िया तुम उडती क्यों नहीं?
चिड़िया तुम गाती क्यों नहीं?
लिख दिए जो माथे पर तुम्हारे,
उन पैमानों में समाती क्यों नहीं?

Monday, 14 October 2013

ग़ज़ल

ईद का चाँद 

आधा चाँद जिंदा है ,आधा गिन के ले रहा साँसें यहाँ
क्या इस ईद भी तुम्हारा, बस ख़त ही आएगा अब्दुल?

कुछ लम्हों पर जिल्द चढ़कर रखी है, यादें पीली पड़ी हैं
चादनी की सफेदी उजला कर देती है, राख की फाकों को अक्सर

दो तारे कह रहे थे, तुमने तगाफुल कर दिए कुछ अश्क मेरे
सारी रात भीगे थे वो परीजात के फूल, ऐसे बरसा था आसमां

मैं आबिदा हूँ, तुम आबिदीन हो मेरे, सारी दीवारों पे है लिख दिया
बरसों हो गए रात को भी, अब ये बेगैरत जुमले सुनते-सुनते

बेतार नहीं चलता, तो चाँद को ही सुना दिए कई रोज़ मैंने गीत अपने
तुमसे कुछ कहता नहीं, ये मगरिब का चाँद भी बेईमान है शायद

अफवाह है यहाँ कि उस देस कोई नमाज़ नहीं पढता दिल से
खुदा करे ये बात सच हो, तुम इसी बहाने से वतन चले आओ

तुम ईद के चाँद हुए हो सब कहते हैं यहाँ, लेकिन
क्या इस ईद भी तुम्हारा, बस ख़त ही आएगा अब्दुल

Friday, 11 October 2013

देवी! कौन सा गान?

हे श्वेतवस्त्रधारिणी कहो, कौन सा गान सुनाती हो?
क्या जन्नत समझा इस जहाँ को, जो परियों के वेश में आती हो?

जलज बनी जल को पावन करती ,क्षण-क्षण रूह भरती नारायणी
जिजीविषा तुम ही घर भर की, तुम्ही हो जीवन दायिनी
किलकारी की गूँज तुम्हारी.....
ईटों में भी घर करती, ईटों को भी घर करती
सीवन की उधडन को भरती, तुम खुद जीवन बन जाती हो,
हे श्वेतवस्त्रधारिणी कहो, कौन सा गान सुनाती हो?

तुम मात-पिता की गौरवी ,भावांश तुम्ही मंदिर-मस्जिद की,
तुम धूप-दीप की भीनी खुशबू हो ,तुम पाक कल्पना हो वाहिद की
नन्ही अँगुलियों से अपनी तुम पत्थर को भी जीवंत हो करती,
समस्त सृष्टि का सार समाये भोले मन में,
हे कन्या! तुम कण-कण में ज़मीर हो भरती
तुम्ही शक्ति की प्रबल परिचायक ,और गीता का ज्ञान हो तुम
क्षण भर के स्पर्श से अपने, शिलाओं को करती महान हो तुम
भूली थी कोयल जो कल घर का रस्ता,
क्या उसकी भटकन का बोध कराती हो,
हे श्वेतवस्त्रधारिणी कहो, कौन सा गान सुनाती हो?
क्या जन्नत समझा इस जहाँ को, जो परियों के वेश में आती हो?

फिर सहसा इक चीख ने जैसे शांत किया सारे महिमा-वर्णन को,
फिर बोल पड़ी आखिर रूंधे गले से वो नन्ही सी देवी जैसे—

सब सुन्दर सब सौमिल है, सब चकाचौंध कविताओं सी
पर देख दशा मेरी मनुज, है कहाँ तुल्य उपमाओं की
देवी कहकर जीवन मेरा, तुम ही हो लेने वाले
मुझको सुख का निर्झर कहकर, अगणित पीडाएं देने वाले

मैं श्वेत्वस्त्रधारिणी ,पवित्रा तुम मुझको कहते हो
मेरे वस्त्रों को जब-तब तुम ही मैला करते रहते हो
इतना ही नहीं तुम सभ्य मनुज,
उस अनहोनी का, दोष भी मुझी पर मढ़ते हो...
  
हाथों की कोमलता मेरी, घर के जूठे बर्तनों पर है छपी हुई,
राख के ढेर उठाने से, है कालिख माथे पर लगी हुई
मुझको जंजीरों में जकड़कर, तुम गाते हो गौरव-गाथा अपने पुरुषार्थ की
अरे अपना घर अँधेरा रखते हो तुम,
लानत! तुम करते हो बातें परमार्थ की

फिर कुछ वक़्त गुज़रता है,
मैं श्वेत्वस्त्रधारिणी से रक्त्वस्त्रधारिणी हो जाती हूँ
हाय! रक्त भी तो मेरा ही है जिससे तुम मुझे सजाते हो
परंपरा कहते हो तुम इसे अपनी
धिक्! किस संस्कृति का ढोल बजाते हो

तार-तार कर सम्मान मेरा,
तुम सोने के आभूषणों से मुझे बाँध देते हो
हाय! गहने नहीं ये लोहे की जंजीरें हैं
मेरे अस्तित्व कर खिंची, अफ़सोस कितनी लकीरें हैं

अरे तुम क्या दोगे शास्त्रों का ज्ञान मुझे
आँखें खोलो और देखो चारों ओर अपने,
वो किताबें जो आना चाहती हैं बाहर ,
इस आधे समाज के अधूरेपन से

अब भी वक़्त है इस ‘देवी’ को, इंसानों सा तो दर्जा दो
या कुछ पहर रुको,
और देखो ये रक्तवस्त्र जो रक्तविहीन हुए कब से
हुआ संकुचित मन का आलय जब से
हुई शर्मसार सारी मानवता तब से....

अब यूँ कौतुहल से न देख मुझे मनुज,
मैं केवल सत्य का बोध कराती हूँ
हाँ मैं ही हूँ दुर्गा-चंडी, मैं ही राधा बन जाती हूँ
नारी हूँ, मैं ही हूँ नारायणी ,मैं पीड़ा का गान सुनाती हूँ
मैं श्वेत्वस्त्रधारिणी हूँ, मैं पीड़ा का गान सुनाती हूँ|
जन्नत समझा था इस जहाँ को, हाँ इसीलिए परियों के वेश में आती हूँ....
यही भूल हुई मुझसे शायद, इसी की सजा पाती हूँ
हाँ, इसी की सजा पाती हूँ|

    

Tuesday, 8 October 2013

The Last Song


What it took to erase the picture that was?
She wondered with a brush in hand, ready to put the last stroke
He kept mum, exhibited a smile diluted with time,   
and a patch on the canvas lost its hue, humbly disappeared  
merged with the white, became spotless for eternity
Who knows what continues to entrance the on-lookers?  

Who stole the moments you lost last September?
she looked at him in curiosity brimming out of her blue eyes
He turned his eyes away, and she let free the last jingle
In the dim light from the fireflies’ glow, a conjurer vanished in the backdrop
The thick woods had taken captive all that was left free of time
Who can decipher the inner music that keeps the madcap going?

What it took to make fly the wingless bird that didn’t return?
The sky shrank a little, she closed her eyes as she read the answer
The ground had swallowed all that he stood for,
Silence silencing the outspoken, the voices of the autumn coming alive
The woods fell and the paper burst out of fire, another tale waiting to be told
Backstage, a mynah sang the last song of the season in her native tongue.   





Tuesday, 1 October 2013

एक फी़की हँसी


 एक फी़की हँसी में गुम हैं

वो चाँद वो सितारे

वो चकाचौंध के नज़ारे

वो बेबात की उदासी,

में शाम का ढलना

वो बेखबर मंजि़ल-ए-जहाँ से

मीलों तक चलना

वो चिलमन में छुपा

एक गीत, एक जुनून

वो हल्की सी बारिश में,

जन्नत-सा सुकून

वो बड़ी-सी मुस्कान

सब सवालों का हल

वो सदियों-से लंबा,

एक छोटा-सा पल

एक फ़ीकी हँसी मे गुम हैं।

 

वे धमाके का सन्नाटा

वो धड़कनों का शोर

वो राहो के वीराने

वो अँधेरा घनघोर

वो ख्वाबों में उनका

चुपके से चले आना

वो टेप में बजता

एक लोरी-सा गाना

वो खुले आसमां में

पंछियों सी उड़ान

वो पुराने तहखाने में रखे

गीता और कुरान

वो हल्के-से दर्द में माँ-माँ चिल्लाना,

वो छोटी सी बात पर जोर से खिलखिलाना

एक फ़ीकी हँसी में गुम हैं।

 

वो हवा के थपेडे़ से लौ का थरथराना

वो मंदिर की घंटियों में आस्था की गूँज

वो पलकों में नमी, वो सूना आँगन

वो राहगीर की प्यास, वो आस की बूँद

वो भावों के बहाव में शब्दों का खो जाना

वो शाम के सूरज की लाली का जादू

वो आँखों ही आँखों में कहानी कह जाना

वो छोटी सी ख्वाहिश का अधूरा रह जाना

वो पतझड़ के मौसम में पत्तों का बिछौना

वो हाथ से छूटा मिटटी का खिलौना

वो छोटे से बच्चे का भोलापन रूहानी

वो काँपते हुए हाथों में छुपी कोर्इ कहानी

ज्यों बीता हो अरसा किसी के इंतजार में

या कर दिया हो पंछी को दूर घोंसले से

तेज, बहुत तेज़ बहती बयार ने

वो बच्चा, वो पंछी, वो बूढ़ा, वो बयार

वो स्मृतियों का खाफिला, वो माँ का प्यार

एक फ़ीकी हँसी में गुम हैं।